Tuesday, 10 October 2017

बात दिल की हमेशा सुना कीजिए


सामने   आप   मेरे   रहा   कीजिए
मुझको मुझसे न ऐसे जुदा कीजिए

है मुहब्बत अगर तो कहा कीजिए
बात दिल की हमेशा सुना कीजिए


क्या ख़ता है मेरी आप क्यूँ हैं ख़फ़ा
गर गिला हो कोई तो कहा कीजिए

कब बदल जाए नीयत किसी की यहाँ
हर किसी से न  हँस के मिला कीजिए

मैंने अहसास दिल का बयाँ कर दिया
यूँ  न  हैरत से मुझको  तका कीजिए
 



© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)
 

Saturday, 9 September 2017

छोड़ दे माजी के ग़म रोता है क्या





दर्द का रिश्ता भला  ढोता  है  क्या
छोड़ दे माजी के ग़म, रोता है क्या

ज़िक्र  क्यों नाकामियों  का कर रहा
जो हो गया वो हो गया रोता है क्या

आदमी  बोता  है जो  वह काटता
जान कर भी ज़ह्र तू बोता है क्या

दाग़ दामन के  कभी  मिटते  नहीं
हाए अब तू अश्क़ से धोता है किया

अहले दिल से पूछ ले क़ीमत कभी
इश्क़ दौलत है बड़ी, खोता है क्या

एक दिन सब  कुछ फ़ना हो जाएगा
फिर किसी की मौत पर रोता है क्या

कौन जाने कब ये किस्सा ख़त्म हो
तेरा किस्सा मुख़्तसर होता है क्या

रफ़्ता-रफ़्ता उम्र हिमकर ढल रही
बैठे- बैठे वक़्त तू खोता है क्या

 © 
हिमकर श्याम


(चित्र गूगल से साभार)


Wednesday, 16 August 2017

हुक़ूमत को किसी से क्या पड़ी है





उलझ  कर  गर्दिशों  में  रह गई है
भला  यह ज़िन्दगी भी ज़िन्दगी है

कोई मरता है  मर जाये  उन्हें क्या
हुक़ूमत को  किसी  से क्या पड़ी है

हुआ आज़ाद  कहने को वतन यह
मगर  क़ायम अभी  तक बेबसी है

फ़क़त  धोका  निगाहों का उजाला
चिराग़ों   के   तले   ही   तीरग़ी   है

ये किसने दी हवा फिर रंजिशों  को
फ़ज़ा में किस क़दर नफ़रत घुली है

कोई हिन्दू, कोई  मुस्लिम यहाँ  पर
   मिलता   ढूंढ़ने  से  आदमी  है

कई  कमज़ोरियाँ  लेकर  चली  थी
यहाँ   ज़म्हूरियत   औंधे   पड़ी  है

© हिमकर श्याम

(चित्र गूगल से साभार)